शुक्रवार, 1 नवंबर 2013

निष्कासन. विस्थापन.








अयोध्या से निष्कासित हुए थे राम
और मुहम्मद मक्का से
विस्थापित हैं कश्मीरी पंडित कश्मीर से
और लामा तिब्बत से
मेरी कविता से निष्कासित है प्रेम
मेरी कविता से निष्कासित है एक स्त्री

शहर घुस आया हैं मेरी कविता मे
जिसमे विस्थापित हूँ मैं

एक दिन झुक जाता हैं मक्का
मुहम्मद के सामने
और शुरू होती हैं इक धर्म की गौरव गाथा
एक दिन सजती हैं अयोध्या
चौदह सालो के विरह के बाद
आज तक जलते हैं उसके दीप

हर निष्कासन का एक सुखद अंत होता हैं.

लेकिन
यहाँ
जम सा गया हैं समय किसी कोने मे
स्मृति की शीत-दिशा में बहते-बहते.

सपनो में उन्हें
अब भी दिख जाते हैं
चिनार के पेड़.
सूखती आँखों में कभी-कभी उतर आता हैं
चिनाब का पानी

"बुद्धं शरणम् गच्छामि"
"संघम शरणम् गच्छामि"
"धम्मम् शरणम् गच्छामि"
के उद्घोष के बीच
अचानक आने लगता हैं एक अशांत मंत्र
"तिब्बत
 तिब्बत
 तिब्बत"

निष्कासन से नहीं
भय मुझे विस्थापन से हैं


जिसमें होता है
शून्य को ताकता
एक अंतहीन सा इंतज़ार

कभी ना ख़त्म होने वाला इंतज़ार |

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